Thursday, November 22, 2007

हर बार होसला करते हैं , फिर खुद ही टूट जाते हैं
इस दिल को खुद ही समझा कर , इस दिल से हार जाते हैं
फिर से रेत को मुठी में पकड़ का ,फिसलता पाते हैं
आँखों में समंदर को समेटते समेटते , छलकता पाते हैं
हर बार कुछ चाह कर , वह खुद ही कर जाते हैं
इंतज़ार करवाते करवाते , खुद ही इंतज़ार करता पाते हैं
जाने क्यों इस दिल को , समझा ही नही पाते हैं
अपने आप खुद को मना ही नहीं पाते हैं
वह क्या समझेंगे जस्बात जिन्हें 'एहसास' ही नही
जाने क्यों हर बार कुछ ऐसे ही दोस्त बना जाते हैं

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